The TOP500 project ranks and details the 500 most powerful known computer systems in the world. The project was started in 1993 and publishes an updated list of the supercomputers twice a year. The project aims to provide a reliable basis for tracking and detecting trends in high-performance computing and bases rankings on HPL, a portable implementation of the High-Performance LINPACK benchmark for distributed-memory computers.
The TOP500 list is compiled by Hans Meuer of the University of Mannheim, Germany, Jack Dongarra of the University of Tennessee, Knoxville, Erich Strohmaier and Horst Simon of NERSC/Lawrence Berkeley National Laboratory.
The list is updated twice a year. The first of these updates always coincides with the International Supercomputer Conference in June, the second one is presented in November at the IEEE Super Computer Conference in the USA.
Tuesday, October 6, 2009
Sunday, October 4, 2009
विंग्स आफ फायर: एन आटोबायोग्राफी आफ एपीजे अब्दुल कलाम
विंग्स आफ फायर: एन आटोबायोग्राफी आफ एपीजे अब्दुल कलाम (१९९९), भारत के पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम की आत्मकथा है। इसके सह-लेखक अरुण तिवारी हैं। इसमे अब्दुल कलाम के बचपन से लेकर लगभग १९९९ तक के जीवन सफर के बारे मे बताया गया है। मूल रुप मे अंग्रेजी मे प्रकाशित यह किताब, विश्व की १३ भाषाओ मे अनूदित हो चुकी है। जिसमे भारत की प्रमुख भाषाए हिंदी, गुजराती, तेलगु, तमिल, मराठी, मलयालम के साथ-साथ कोरियन, चीनी और ब्रेल लिपि भी शामिल है।
स्वरूप
आत्मकथा ४ भागों में विभाजित है।
अनुस्थापन
अनुस्थापन(Orientation)शीर्षक से लिखा गया पहला भाग, तीन अध्यायों मे विभाजित है। इसमे डॉ. अब्दुल कलाम के बचपन से ले के पहले ३२ वर्षो के संस्मर्णो का वर्णन है। इन वर्षों मे डा. कलाम के बचपन, शिक्षा और शुरूआती कार्यजीवन के बारे मे बताया गया है। डा. कलाम का जन्म तमिलनाडु मे रामेश्वरम मे मध्यम वर्गीय तमिल मुस्लिम परिवार में हुआ था। उनके परिवार, चचरे भाईयों, शिक्षकों और अन्य लोगों से पडे प्रभावों के बारे में वर्णन किया गया है। रामेश्वरम में प्राइमरी स्कूल में पढ़ने के बाद, डॉ. कलाम शवार्टज़ हाई स्कूल, रामनाथपुरम गए और वहाँ से उच्च शिक्षा के लिए सेंट जोज़िफ़ कालेज, तीरुच्छीरापल्ली (त्रिची) गए। उनके शिक्षा के बारे मे किए गए वर्णन मे वे अपने शिक्षकों और उनके साथ हुए अनुभवों के बारे में बताते हैं। सेंट जोज़िफ़ कालेज से बीएससी पास करने के बाद विमान-विज्ञान की पढ़ाई करने के लिए उन्होंने मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नालोजी (MIT) में दाखिला लिया। १९५८ में मद्रास इंस्टीट्यूट आफ टेकनालजी से अंतरिक्ष विज्ञान में स्नातक की उपाधि प्राप्त की है। एम आई टी से एक प्रशिक्षार्थी के रूप में वह एच ए एल बैंगलोर गए। इसके बाद डॉ. कलाम ने डी टी डी एंड पी (वायु) के तकनीकी केन्द्र (सिविल विमानन) में वरिष्ठ वैज्ञानिक सहायक के रूप में २५० मासिक मूल वेतन पर नौकरी आरंभ की। इस भाग के अंत मे वे ६ महीने के प्रशिक्षण के लिए नासा, अमेरिका जाते है।
सृजन
सृजन(Creation) भाग, ७ अध्यायो मे है, अध्याय ४ से अध्याय १० तक। इसमे डा. कलाम के जीवन के १७ सालों (१९६३-१९८०) का वर्णन है। इस भाग में, इन वर्षो मे हुए उनके काम और भारत के तकनीकी विकास की कहानी मिलती है। डा. कलाम इसरो मे काम करने वाले एक इंजीनीयर से देश की बहुचर्चित तकनीकी परियोजना, एसएलवी के प्रमुख बनते है। इस दौरान उनको अन्य छोटी बड़ी सफलता और असफलाताओं से सामना करना पडता है। वे न केवल उच्च अधिकारियों का वर्णन करते है वरन कई उभरते हुए वैज्ञानिकों के साथ हुए अनुभवों के बारे में भी लिखते हैं। १९७६ मे उनके पिता का देहांत होता है। १९८१ मे उन्हें पद्मभूषण मिलता है। इस भाग के अंत मे वे डीआरडीएल के निर्देशक के रूप मे चुने जाते हैं|
प्रसादन
प्रसादन(Propitiation) इस भाग मे डा. कलाम के जीवन के अगले १० सालों के बारे मे लिखा गया है। यह भाग ५ अध्यायो में है, अध्याय ११ से अध्याय १४ तक। इस भाग में उनके द्वारा डीआरडीएल में किए उनके प्रबंधन संबंधित कार्यो का ज्यादा वर्णन है। डीआरडीएल प्रयोगशाला डा. कलाम के प्रबंधन के अंतर्गत आत्मविश्वास के साथ भारत के मिसाइल परियोजना का निर्माण करती है। इस भाग में वे वर्णन करते हैं कि कैसे वे इस काम को अंजाम देने के लिए व्यक्तियों का चुनाव करते है। उनके रास्ते मे आई मुश्किलों को हल करने के लिए वे पारंपरिक शैली से हटकर नए निर्णय लेते हैं। वे शिक्षण संस्थाओं के साथ भी भागीदारी करते हैं।
अवलोकन
अवलोकन(Contemplation) नामक अंतिम भाग २ अध्यायो में है, अध्याय १५ और अध्याय १६। इसमें डा. कलाम के जीवन के अगले ९ सालों (१९९१-१९९९) तक का वर्णन है। इस भाग में डा. कलाम अपने जीवन के अनुभवों, ज्ञान और विचार को संकलित करते है। वर्ष १९९७ में भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित होते हैं और देश की आने वाली पीढ़ी को संदेश देते हैं।
स्रोत : विकिपीडिया
स्वरूप
आत्मकथा ४ भागों में विभाजित है।
अनुस्थापन
अनुस्थापन(Orientation)शीर्षक से लिखा गया पहला भाग, तीन अध्यायों मे विभाजित है। इसमे डॉ. अब्दुल कलाम के बचपन से ले के पहले ३२ वर्षो के संस्मर्णो का वर्णन है। इन वर्षों मे डा. कलाम के बचपन, शिक्षा और शुरूआती कार्यजीवन के बारे मे बताया गया है। डा. कलाम का जन्म तमिलनाडु मे रामेश्वरम मे मध्यम वर्गीय तमिल मुस्लिम परिवार में हुआ था। उनके परिवार, चचरे भाईयों, शिक्षकों और अन्य लोगों से पडे प्रभावों के बारे में वर्णन किया गया है। रामेश्वरम में प्राइमरी स्कूल में पढ़ने के बाद, डॉ. कलाम शवार्टज़ हाई स्कूल, रामनाथपुरम गए और वहाँ से उच्च शिक्षा के लिए सेंट जोज़िफ़ कालेज, तीरुच्छीरापल्ली (त्रिची) गए। उनके शिक्षा के बारे मे किए गए वर्णन मे वे अपने शिक्षकों और उनके साथ हुए अनुभवों के बारे में बताते हैं। सेंट जोज़िफ़ कालेज से बीएससी पास करने के बाद विमान-विज्ञान की पढ़ाई करने के लिए उन्होंने मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नालोजी (MIT) में दाखिला लिया। १९५८ में मद्रास इंस्टीट्यूट आफ टेकनालजी से अंतरिक्ष विज्ञान में स्नातक की उपाधि प्राप्त की है। एम आई टी से एक प्रशिक्षार्थी के रूप में वह एच ए एल बैंगलोर गए। इसके बाद डॉ. कलाम ने डी टी डी एंड पी (वायु) के तकनीकी केन्द्र (सिविल विमानन) में वरिष्ठ वैज्ञानिक सहायक के रूप में २५० मासिक मूल वेतन पर नौकरी आरंभ की। इस भाग के अंत मे वे ६ महीने के प्रशिक्षण के लिए नासा, अमेरिका जाते है।
सृजन
सृजन(Creation) भाग, ७ अध्यायो मे है, अध्याय ४ से अध्याय १० तक। इसमे डा. कलाम के जीवन के १७ सालों (१९६३-१९८०) का वर्णन है। इस भाग में, इन वर्षो मे हुए उनके काम और भारत के तकनीकी विकास की कहानी मिलती है। डा. कलाम इसरो मे काम करने वाले एक इंजीनीयर से देश की बहुचर्चित तकनीकी परियोजना, एसएलवी के प्रमुख बनते है। इस दौरान उनको अन्य छोटी बड़ी सफलता और असफलाताओं से सामना करना पडता है। वे न केवल उच्च अधिकारियों का वर्णन करते है वरन कई उभरते हुए वैज्ञानिकों के साथ हुए अनुभवों के बारे में भी लिखते हैं। १९७६ मे उनके पिता का देहांत होता है। १९८१ मे उन्हें पद्मभूषण मिलता है। इस भाग के अंत मे वे डीआरडीएल के निर्देशक के रूप मे चुने जाते हैं|
प्रसादन
प्रसादन(Propitiation) इस भाग मे डा. कलाम के जीवन के अगले १० सालों के बारे मे लिखा गया है। यह भाग ५ अध्यायो में है, अध्याय ११ से अध्याय १४ तक। इस भाग में उनके द्वारा डीआरडीएल में किए उनके प्रबंधन संबंधित कार्यो का ज्यादा वर्णन है। डीआरडीएल प्रयोगशाला डा. कलाम के प्रबंधन के अंतर्गत आत्मविश्वास के साथ भारत के मिसाइल परियोजना का निर्माण करती है। इस भाग में वे वर्णन करते हैं कि कैसे वे इस काम को अंजाम देने के लिए व्यक्तियों का चुनाव करते है। उनके रास्ते मे आई मुश्किलों को हल करने के लिए वे पारंपरिक शैली से हटकर नए निर्णय लेते हैं। वे शिक्षण संस्थाओं के साथ भी भागीदारी करते हैं।
अवलोकन
अवलोकन(Contemplation) नामक अंतिम भाग २ अध्यायो में है, अध्याय १५ और अध्याय १६। इसमें डा. कलाम के जीवन के अगले ९ सालों (१९९१-१९९९) तक का वर्णन है। इस भाग में डा. कलाम अपने जीवन के अनुभवों, ज्ञान और विचार को संकलित करते है। वर्ष १९९७ में भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित होते हैं और देश की आने वाली पीढ़ी को संदेश देते हैं।
स्रोत : विकिपीडिया
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Saturday, October 3, 2009
ओलंपिक 2016
कोपेनहेगेन। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा का जादू भी शिकागो को ओलंपिक मेजबानी दिलाने में नाकाम रहा और ब्राजील के शहर रियो डि जेनेरियो ने 2016 में होने वाले खेल महांकुभ की मेजबानी हासिल करके बाजी मार ली।
दुनिया के सबसे ताकतवर व्यक्ति का भावनात्मक आग्रह भी काम नहीं आया। इससे ओलंपिक की मेजबानी को लेकर चली कड़ी जंग का पता भी चलता है जिसमें रियो डि जेनेरिया ने मैड्रिड, टोक्यो और शिकागो को पीछे छोड़कर ओलंपिक का मेजबान बनने का गौरव हासिल किया। यह पहला अवसर होगा जबकि दक्षिण अमेरिका के किसी शहर में इन खेलों का आयोजन किया जाएगा। रियो डि जेनेरियो के लिए हालांकि मेजबानी हासिल करना आसान नहीं रहा। होनोलुलु में जन्में ओबामा अपने विरोधियों की आलोचना को दरकिनार करके शिकागो का पक्ष रखने के लिए स्वयं यहां मौजूद थे। वह डेनमार्क की राजधानी में जितने समय भी रहे उनका एकमात्र एजेंडा शिकागो को मेजबानी दिलवाना रहा।
अमेरिकी की प्रथम महिला मिशेल ओबामा ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी। वह शिकागो की रहने वाली है और बुधवार से उन्होंने यहां कई बैठकों में भाग लिया लेकिन उनका जादू भी मतदाताओं को नहीं रिझा पाया। मिशेल ने वादा किया था, 'हम इन खेलों को दुनिया तक पहुंचने के लिए वाहन की तरह उपयोग करेंगे।' लेकिन यह सब काम नहीं आया तथा शिकागो मतदान के पहले दौर में बाहर हो गया। शिकागो की तरह टोक्यो ने भी काफी कोशिश की थी। ओबामा के बाद जापान के प्रधानमंत्री युकी होतोयामा ने प्रभावशाली प्रस्तुति दी थी और बताया कि पर्यावरणीय दृष्टि से टोक्यो का ग्रीन ओलंपिक का आयोजन करना कितना महत्वपूर्ण है।
मेजबानी की दौड़ में शामिल चारों शहरों में से केवल टोक्यो को ही ओलंपिक के आयोजन का अनुभव था। उसने 1964 में ओलंपिक की मेजबानी की थी। टोक्यो भी मतदाताओं को नहीं रिझा पाया और दूसरे दौर में बाहर हो गया जिससे मुकाबला रियो डि जेनेरिया और मैड्रिड के बीच रह गया। स्पेन के प्रधानमंत्री जोस लुईस रोड्रिग्ज जापाटेरो ने मैड्रिड की दावेदारी की अगुवाई की। स्पेन में इससे पहले 1992 में बार्सिलोना में ओलंपिक का आयोजन किया गया था। स्पेन के प्रतिनिधिमंडल में आईओसी के पूर्व अध्यक्ष 89 वर्षीय जुआन एंतेनियो समारांच भी थे जिन्होंने मैड्रिड को मेजबानी देने की अपील की। स्पेन के राजा जुआन कार्लोस और फुटबाल क्लब रीयाल मैड्रिड के कप्तान राल भी मौजूद थे लेकिन रियो डि जेनेरियो के सामने किसी की नहीं चली।
ओबामा की तरह ब्राजील के राष्ट्रपति लुई इनासियो लुला डी सिल्वा अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति [आईओसी] के 95 मतदाताओं को रिझाने के लिए यहां पहुंचे थे। उन्होंने कहा, 'मैं ईमानदारी से कहता हूं कि अब ब्राजील का वक्त है। दुनिया में आर्थिक रूप से चोटी के दस देशों में ब्राजील ही ऐसा है जिसने ओलंपिक आयोजन नहीं किया है। हमें मौका दो और आपको इस पर खेद नहीं होगा।' ब्राजील ने फीफा के पूर्व अध्यक्ष 93 वर्षीय जाओ हावेलेंज को रियो डि जेनेरियो की प्रस्तुति की शुरुआत करने के लिए चुना और उन्होंने बड़ी भावनात्मक अपील की। हावेलेंज ने कहा, 'मैं आप सभी को अपने 100वें जन्मदिन पर 2016 में नए ब्राजील में अपने शहर में आमंत्रित करता हूं। रियो में मेरा जन्म हुआ। वहीं से मैंने अपनी यात्रा शुरू की और इतिहास बनते हुए देखा।'
स्रोत : याहू न्यूज़
दुनिया के सबसे ताकतवर व्यक्ति का भावनात्मक आग्रह भी काम नहीं आया। इससे ओलंपिक की मेजबानी को लेकर चली कड़ी जंग का पता भी चलता है जिसमें रियो डि जेनेरिया ने मैड्रिड, टोक्यो और शिकागो को पीछे छोड़कर ओलंपिक का मेजबान बनने का गौरव हासिल किया। यह पहला अवसर होगा जबकि दक्षिण अमेरिका के किसी शहर में इन खेलों का आयोजन किया जाएगा। रियो डि जेनेरियो के लिए हालांकि मेजबानी हासिल करना आसान नहीं रहा। होनोलुलु में जन्में ओबामा अपने विरोधियों की आलोचना को दरकिनार करके शिकागो का पक्ष रखने के लिए स्वयं यहां मौजूद थे। वह डेनमार्क की राजधानी में जितने समय भी रहे उनका एकमात्र एजेंडा शिकागो को मेजबानी दिलवाना रहा।
अमेरिकी की प्रथम महिला मिशेल ओबामा ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी। वह शिकागो की रहने वाली है और बुधवार से उन्होंने यहां कई बैठकों में भाग लिया लेकिन उनका जादू भी मतदाताओं को नहीं रिझा पाया। मिशेल ने वादा किया था, 'हम इन खेलों को दुनिया तक पहुंचने के लिए वाहन की तरह उपयोग करेंगे।' लेकिन यह सब काम नहीं आया तथा शिकागो मतदान के पहले दौर में बाहर हो गया। शिकागो की तरह टोक्यो ने भी काफी कोशिश की थी। ओबामा के बाद जापान के प्रधानमंत्री युकी होतोयामा ने प्रभावशाली प्रस्तुति दी थी और बताया कि पर्यावरणीय दृष्टि से टोक्यो का ग्रीन ओलंपिक का आयोजन करना कितना महत्वपूर्ण है।
मेजबानी की दौड़ में शामिल चारों शहरों में से केवल टोक्यो को ही ओलंपिक के आयोजन का अनुभव था। उसने 1964 में ओलंपिक की मेजबानी की थी। टोक्यो भी मतदाताओं को नहीं रिझा पाया और दूसरे दौर में बाहर हो गया जिससे मुकाबला रियो डि जेनेरिया और मैड्रिड के बीच रह गया। स्पेन के प्रधानमंत्री जोस लुईस रोड्रिग्ज जापाटेरो ने मैड्रिड की दावेदारी की अगुवाई की। स्पेन में इससे पहले 1992 में बार्सिलोना में ओलंपिक का आयोजन किया गया था। स्पेन के प्रतिनिधिमंडल में आईओसी के पूर्व अध्यक्ष 89 वर्षीय जुआन एंतेनियो समारांच भी थे जिन्होंने मैड्रिड को मेजबानी देने की अपील की। स्पेन के राजा जुआन कार्लोस और फुटबाल क्लब रीयाल मैड्रिड के कप्तान राल भी मौजूद थे लेकिन रियो डि जेनेरियो के सामने किसी की नहीं चली।
ओबामा की तरह ब्राजील के राष्ट्रपति लुई इनासियो लुला डी सिल्वा अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति [आईओसी] के 95 मतदाताओं को रिझाने के लिए यहां पहुंचे थे। उन्होंने कहा, 'मैं ईमानदारी से कहता हूं कि अब ब्राजील का वक्त है। दुनिया में आर्थिक रूप से चोटी के दस देशों में ब्राजील ही ऐसा है जिसने ओलंपिक आयोजन नहीं किया है। हमें मौका दो और आपको इस पर खेद नहीं होगा।' ब्राजील ने फीफा के पूर्व अध्यक्ष 93 वर्षीय जाओ हावेलेंज को रियो डि जेनेरियो की प्रस्तुति की शुरुआत करने के लिए चुना और उन्होंने बड़ी भावनात्मक अपील की। हावेलेंज ने कहा, 'मैं आप सभी को अपने 100वें जन्मदिन पर 2016 में नए ब्राजील में अपने शहर में आमंत्रित करता हूं। रियो में मेरा जन्म हुआ। वहीं से मैंने अपनी यात्रा शुरू की और इतिहास बनते हुए देखा।'
स्रोत : याहू न्यूज़
Friday, October 2, 2009
Maharaja Ajit Singh of Khetri
Maharaja Ajit Singh Bahadur (1861-1901) was a ruler of the Indian princely state of Khetri between 1870-1901. He was a close friend and disciple of Swami Vivekananda. Ajit Singh is know for his monetary support he provided to Vivekananda, and encouraging him to speak at the Parliament of the World's Religions at Chicago in 1893.
Swami Vivekananda and Ajit Singh had a very intimate and cordial relationship. Vivekananda first visited Ajit Singh as a wandering monk in 1891. As a state-guest, Swamiji spent two and a half months at Khetri. Influenced by Vivekananda's ideas, he became his disciple. Later when Vivekananda decided to sail to the West to talk at the Parliament of the World's Religions in Chicago at 1893, Ajit Singh provided him the financial aid and got him the ticket for the ship to America from Bombay. It was under Ajit Singh's request, that Vivekananda assumed his monastic name.
Vivekananda wrote a stream of letters to Ajit Singh from the West, and later from India. Ajit singh is known for the financial support he provided for Vivekananda for his social service. On 17 December 1897, at Khetri, Swamiji said in a meeting that whatever little he had done for the uplift of India would not have been possible had he not met the Raja of Khetri. Again, he wrote in a letter to Munshi Jagmohanlal on 11 October 1897, "Certain men are born in certain periods to perform certain actions in combination. Ajit Singh and myself are two such souls—born to help each other in a big work for the good of mankind.… We are as supplement and complement."
In 1958, Ramakrishna Mission was started at the Palace of Khetri, which was donated by Raja Ajit Singh's grandson, Raja Bahadur Sardar Singh. The palatial building has been named as "Vivekananda Smriti Mandir", which houses marble statues of Raja Ajit Singh and Swami Vivekananda. The room at the topmost storey where Swamiji used to stay and had spiritual discourses with Raja Ajit Singhji, has been converted into a prayer room.
External links
Ref: Wikipedia
Swami Vivekananda and Ajit Singh had a very intimate and cordial relationship. Vivekananda first visited Ajit Singh as a wandering monk in 1891. As a state-guest, Swamiji spent two and a half months at Khetri. Influenced by Vivekananda's ideas, he became his disciple. Later when Vivekananda decided to sail to the West to talk at the Parliament of the World's Religions in Chicago at 1893, Ajit Singh provided him the financial aid and got him the ticket for the ship to America from Bombay. It was under Ajit Singh's request, that Vivekananda assumed his monastic name.
Vivekananda wrote a stream of letters to Ajit Singh from the West, and later from India. Ajit singh is known for the financial support he provided for Vivekananda for his social service. On 17 December 1897, at Khetri, Swamiji said in a meeting that whatever little he had done for the uplift of India would not have been possible had he not met the Raja of Khetri. Again, he wrote in a letter to Munshi Jagmohanlal on 11 October 1897, "Certain men are born in certain periods to perform certain actions in combination. Ajit Singh and myself are two such souls—born to help each other in a big work for the good of mankind.… We are as supplement and complement."
In 1958, Ramakrishna Mission was started at the Palace of Khetri, which was donated by Raja Ajit Singh's grandson, Raja Bahadur Sardar Singh. The palatial building has been named as "Vivekananda Smriti Mandir", which houses marble statues of Raja Ajit Singh and Swami Vivekananda. The room at the topmost storey where Swamiji used to stay and had spiritual discourses with Raja Ajit Singhji, has been converted into a prayer room.
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Tuesday, September 29, 2009
Quillpad
Quillpad is a free online Indian language typing tool. You can type in Hindi, Gujarati, Punjabi, Marathi, Telugu, Tamil, Kannada, Malayalam, Bengali and Nepali. For example, when you type 'aap kaise hain' in Hindi, Quillpad will convert it directly into Devanagari script. If you write a word like 'vishesh', first sh should become 'श' and the second sh should become 'ष'. Quillpad will intelligently do that for you. No need to use shift keys or to memorize any key mappings. So 'राष्ट्रपति' can be written by typing 'rashtrapati' or 'raashtrapathi'. Quillpad can also predict if multiple words are possible for your input. You can click on the word to select from those options. In addition Quillpad allows you to type English words freely in between Hindi words. It intelligently transliterates them into Hindi.
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